THE RAIN OF MY LOVE (2)
"क्या इंसान वाकई कभी तन्हा हो पाता है ? क्या तन्हाइयां वाकई तन्हा होती हैं ? यहाँ तो हमेशा तन्हाइयों में ढ़ेर सारी यादें जमा हो जाती हैं , न जाने कहाँ कहाँ से आ जाती हैं , बस उन्हें एक मौका चाहिए कि हमारे आस पास कोई और न हो , शायद दूसरों से शर्माती हैं ये यादें या फिर डरती हो शायद ! इन्हें अच्छा लगता है कि कोई इनसे बातें करे वो भी एक दम एकांत में , कोई गुनगुनाये इन्हें खामोशियों में एक धीमी सी आवाज़ में जो बस धड़कनों तक सिमट जाये और फैल जाए रूह में ! कोई अकेला होकर भी अकेला नहीं सच तो यही है , जिंदगी बीती यादों का गरौंधा है , यादें घूमते रहती हैं जिंदगी के घर में कभी दिल में जाती हैं कभी आँखों में , और कभी किसी कहानी में तो कभी किसी ग़ज़ल में ! बस यादें ही तो हैं चारों ओर , कुछ सुलझी हुईं यादें कुछ बिलकुल उलझी हुईं यादें और इन दोनों के बीच इंसान और उसकी झूठी तन्हाई , कई बार तो समझ में ही नहीं आता कि आप आज उदास क्यों हैं , क्यों ऐसा है कि कुछ भी करने का मन नहीं कर रहा आज , कभी कभी अपना ही मन कितना अनभिज्ञ मालूम पड़ता है , ऐसा लगता है कि मन अपना होता ही नहीं शायद ये अपना होकर भी दूसरों पे टिका होता है , दूसरों की ख़ुशी दूसरों के गम बहुत कुछ दूसरों के हमारा मन गढ़ते हैं , अजीब बात है न ! पर सच भी है !
काश कि ये अपना मन वाकई अपना होता तो शायद कई मुश्किलें समझ में आ जातीं और अगर समझ में आ जातीं तो कोई न कोई समाधान भी निकल आता लेकिन काश अभी मुकम्मल है , ये काश इतनी आसानी से तो नहीं हटने वाला फिर भी कोशिश में क्या जाता है , आइये कभी अपने मन को अपना कर के देखे और अपनी तन्हाइयों को खुद तक रख के देखे , हाँ मुश्किल तो है पर मजा भी है !"
-शशिष कुमार तिवारी
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